अभिनय, सुर एवं ताल की त्रिवेणी से अविस्मरणीय हुआ दीक्षान्त सप्ताह

 


अभिनय, सुर एवं ताल की त्रिवेणी से अविस्मरणीय हुआ दीक्षान्त सप्ताह


गोरखपुर विश्वविद्यालय। दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के 38 वें दीक्षांत सप्ताह समारोह के अंतर्गत नृत्य,संगीत एवं रंगमंच से सजी सांस्कृतिक संध्या आयोजित की गई। सांस्कृतिक संध्या की पहली कड़ी महाप्रभु श्रीवल्लभाचार्य रचित मधुराष्टकं के "नयनं मधुरं हसितं मधुरम्। हृदयं मधुरं गमनं मधुरं, मधुराधिपतेरखिलं मधुरम्" पर भरतनाट्यम की प्रस्तुति से बनी। तत्पश्चात प्रसिद्ध भरतनाट्यम नृत्यांगना डॉ. स्मिता लाहकर ने राग यमन कल्याण पर आधारित प्पद 'कृष्णा नी बेगाने बारो....." की प्रस्तुति से सबका मन मोह लिया। पहले बालरूप श्रीकृष्ण की मधुरता का मधुरतम वर्णन किया गया, जिनके संयोग से अन्य सजीव और निर्जीव वस्तुएं भी मधुरता को प्राप्त कर लेती हैं तो दूसरे में प्रेम, राग एवं द्वेष को अभिव्यक्ति मिली। नृत्य के माध्यम से भगवान श्री कृष्ण के बाल चरित्र, द्रौपदी चीर-हरण एवं कुरूक्षेत्र में गीता उपदेश जैसे प्रसंगो को बड़े ही मोहक ढ़ग से दर्शको के सामने सजीव कर दिया गया। असम से आयी हुई कलाकार स्मिता लेहकर ने भाव पूर्ण नृत्य द्वारा दर्शकों के समक्ष श्री कृष्ण छवि को उकेर पूरे कार्यक्रम को मधुमय किया, जिसे उनकी  सहयोगी ज्योति संध्या की प्रस्तुति ने और भी जीवंत बनाकर दर्शकों को आनन्दित कर दिया।
    
    कत्थक नृत्य वाराणसी से आये कलाकार श्री विशाल कृष्ण एवं उनके सहयोगी शियाना कृष्ण,अर्चना सिंह एवं नूरिया कम्बों (स्पेन)द्वारा प्रस्तुत किया गया। उन्होंने अपने अद्भूत प्रदर्शन से दर्शको को महादेव एवं महिषासुरमर्दनी दुर्गा के दर्शन करवायें तथा "आज जाने की जिद ना करो" सुप्रसिद्ध गज़ल को भी अपने नृत्य के द्वारा प्रस्तुत किया। 


    कार्यक्रम में राजा मानसिंह तोमर संगीत एवं कला विश्वविद्यालय के नाटक एवं रंगमंच संकाय के छात्रों ने विलुप्त बुंदेलखंड की लोक नाट्य परंपरा सॉन्ग शैली पर आधारित नाटक साधु और सुंदरी का मंचन किया जिसे खूब सराहा गया। यह नाटक मूल रूप से संस्कृत के महान नाटककार महाकवि बोधायन द्वारा लिखित और डॉ. हिमांशु द्विवेदी द्वारा बुंदेली लोक सॉन्ग शैली में रूपांतरित, अनुवादित व निर्देशित है ! नाटक की प्रस्तुति में डॉ हिमांशु द्विवेदी ने बुंदेलखंड के गीत, संगीत्, नृत्य आदि का प्रचुर मात्रा में प्रयोग किया है तथा इसे बुंदेलखंड की विलुप्त होती लोक नाट्य परंपरा सॉन्ग शैली में प्रस्तुत किया है! नाटक में मानवेंद्र सिंह, निशांत कुमार आर्य, प्रगति परिहार, रिशु गंगवार, दीपा साहू, गौरव, लक्ष्य अरोड़ा, सारांश भारद्वाज एवं सुमित ने प्रमुख भूमिका निभाई। संगीत कृतेंद्र, स्वराज, अभिषेक, नरेंद्र, सुजीत एवं प्रकाश परिकल्पना महेंद्र सिंह तोमर ने की।


कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में विश्वविद्यालय की प्रथम महिला श्रीमती गीता सिंह जी, विशिष्ट अतिथि गोरखपुर की पूर्व मेयर सत्या पाण्डेय एवं प्रति कुलपति प्रो. हरिशरण की उपस्थिति रही, जहाँ रंगारंग कार्यक्रम त्रिवेणी द्वारा आनन्द की अजस्र धारा प्रवाहित होती रही और विश्वविद्यालय एवं नगर का बुद्धजीवी वर्ग उसमें डुबकियाँ लगाता रहा।


सांस्कृतिक संध्या-त्रिवेणी के विषय को वर्णित करते हुए कार्यक्रम संयोजिका प्रो. उमा श्रीवास्तव ने कहा कि यह तीन वेणीयों में गुथी हुई माला है, जो संगीत की तीन विधाओं- कत्थक ,भरतनाट्यम् एंव अभिनय पर आश्रित है।नृत्य, संगीत और रंगमंच की यह त्रिवेणी मनुष्य के उद्भव काल से ही अस्तित्व में है।


कार्यक्रम का संचालन संगीत विभाग के सहायक आचार्य शुभकंर डे के एवं स्वागत भाषण प्रो. उमा श्रीवास्तव द्वारा किया गया। प्रो.उषा सिंह ने कलाकारों का परिचय दिया एवं आभार ज्ञापन प्रो. बीना बत्रा कुशवाहा द्घारा किया गया।


कार्यक्रम के दौरान मुख्य तौर पर यें उपस्थित रहे


अधिष्ठाता कला संकाय प्रो. श्रीप्रकाश मणि त्रिपाठी, विधि संकाय अध्यक्ष प्रो. जितेन्द्र मिश्र, प्रो. मुरली मनोहर पाठक, प्रो. मुकुंद शरण त्रिपाठी, प्रो. हर्ष कुमार सिन्हा, मीडया प्रभारी प्रो. अजय शुक्ल,  प्रो.आलोक गोयल,प्रो. विनोद कुमार सिंह, प्रो. नंदिता सिंह, प्रो. सुधा यादव, प्रो. गौर हरि बेहरा, वित्त अधिकारी श्री वीरेंद्र चौबे,पूर्व वित्त अधिकारी अतुल श्रीवास्तव, प्रो. शरद मिश्रा, डॉ. लक्ष्मी मिश्रा, डॉ. अंशु गुप्ता, डॉ. मनीष पांडे, डॉ. श्रद्धा शुक्ला, डॉ. अमित उपाध्याय, डॉ. महेंद्र सिंह डॉ. अनुपम सिंह, डॉ. आशीष शुक्ला, डॉ. टी. एन. मिश्रा, डॉ. शैलेश चौहान, डॉ ओ.पी. सिंह, डॉ. सुधाकर लाल श्रीवास्तव, डॉ. महेंद्र सिंह, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के प्रांत संगठन मंत्री आनंद गौरव एवं शरद मणि त्रिपाठी आदि।