अतुलनीय महा-लोकपर्व

विचार /त्यौहार /छठ पर्व


छठ पूजा की फिलॉसफी पर गौर किया जाए तो ये सामाजिक विभेदकारी प्रवृत्ति के विरुद्ध समानता पर बल देती है । सूर्य की पूजा के साथ साथ , उनकी बहन की पूजा का विधान , संतान प्राप्ति की कामना में पुत्र , पुत्री दोनों की कामना , सर्वगुण सम्पन्न दामाद की कामना,  क्या ये लैंगिक समानता की सामाजिक पुष्टि नही है ?? समस्त चराचर जगत को अपने प्रकाश  जीवन से समान रूप से आलोकित करने वाला सूर्य , जिसके देव रूप की पूजा से जुड़ा यह  छठ पर्व की सामाजिक विभेदकारी रूप जाति, वर्ग , प्रस्थिति, लिंग , से परे सभी को एक ही घाट पर,एक ही समय पर ,लौकिक देवता सूर्य  को  ॐ सूर्याय नमः की सामूहिक ध्वनि के साथ सम्बद्ध करने की शक्ति समानता के सामाजिक सिद्धान्त को दर्शाती है ।
छठ का यह पर्व  अपने हिसाब से समाज को गढ़ता है । यहाँ महत्वपूर्ण भूमिका में कोई नहीं है ,क्योकि पतित पावनी गंगा की पवित्र जलधारा के साथ ही समस्त नदियों, तालाबों, पोखरों, जलाशयों के साथ ही स्व निर्मित अस्थायी जलकुंड भी समान रूप से श्रद्धा के प्रतीक हैं। 
समस्त विश्व को समान रूप से जीवन प्रदायी ,प्रकृति एव पर्यावरण के रक्षक सूर्य देव के उदय के साथ ही , अस्ताचलगामी सूर्य की पूजा , भारतीय समाज की समग्रवादी एवं आशावादी प्रकृति को प्रदर्शित करती है।इसीलिए आज छठ पूजा की व्यापकता वैश्विक परिदृश्य में दृष्टिगोचर हो रही है ।यह अतुलनीय महा-लोकपर्व है।