विज्ञान के दौर में आस्था का पर्व छठ

विचार/ त्यौहार /छठ पर्व.


विज्ञान के दौर में आस्था का पर्व छठ


पूरे देश में छठ का महापर्व आस्था और पवित्रता के साथ मनाया जाता है। आज जब पूरी दुनिया में विज्ञान और तकनीक का दौर चल रहा है।भारत के वैज्ञानिकों ने भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के नेतृत्व में मंगल और चंद्रमा की यात्रा पूरी कर रहे हैं तब सूर्य उपासना का यह पर कई तरह के सवाल हम सबके सामने खड़ा करता है?जब हमें अंधविश्वास के खिलाफ लड़ने का समय है तो हमारे देश की एक बड़ी आबादी आस्था के नाम पर इस तरह के पर्व मना रही है। बाजार भी ऐसे पर्वो को प्रोत्साहित कर अपना मुनाफा कमाना चाहता है। राजनीतिक ताकतें भी आस्था के नाम पर मजबूत ही करती हैं। भले ही हमारा समाज अंधविश्वास के रास्ते पर ही आगे क्यों न बढ़ रहा है। बावजूद इसके हमें इस पर्व के लोग पक्ष पर भी थोड़ा गौर करना होगा।
यूं तो उगते हुए सूर्य को पूरी दुनिया प्रणाम करती है लेकिन पूर्वांचल की धरती के लोग न सिर्फ उगते सूर्य को प्रणाम व स्वागत करते हैं बल्कि अस्ताचलगामी सूर्य को भी पूरी आस्था,श्रद्धा व विश्वास के साथ  प्रणाम करते हुए पुनःउदय होने की कामना करते हैं।यह दिन छठ पर्व के रूप में आज लगभग देश के बडे हिस्से में मनाया जा रहा है।यह पर्व पूर्णतः सूर्योपासना का है।


 इसकी ऐतिहासिकता से अलग अगर इसकी बढती लोकप्रियता की बात करें तो लगभग एक दशक पूर्व तक यह पर्व पूर्वी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर,देवरिया,बलिया तथा विहार राज्य की सीमा से सटे जनपदों में कम अधिक मनाया जाता था।जानकार बतातें है कि बिहार राज्य में छठ पर्व खासा लोकप्रिय है।आज जब हम इस पर्व की लोकप्रियता की ओर नजर डालते हैं तो हमें देश की राजधानी नई दिल्ली,मुंबई समेत देश के विभिन्न भागों में इसकी बढती लोकप्रियता दिखाई पडती है। आज यह पर्व महापर्व का रूप ग्रहण कर चुका है।यह लोकपर्व श्रद्धा,पवित्रता और और विश्वास के वातावरण में महिलाएं मनाती हैं। व्रत करने वाले को यह पूरा विश्वास होता है कि छठी मईया जरूर उसकी मनोकामना पूरी करेंगी। 
              छठ पर्व सादगी और पवित्रता के साथ मनाया जाता है।इस पर्व पर कुछ वर्ष पूर्व तक बाजार का प्रभाव काफी कम था लेकिन बढते बाजार ने इस लोकपर्व में भी अपनी सेंध लगा दी है।बावजूद इसके अभी भी यह लोक पर्व पूरी तरह गांवों में उपलब्ध सामानों से ही संपन्न हो जाता है।इसमें बांस की बनी टोकरी,सूप मिटटी के दीये, गुड,गन्ना, चावल, आंटे का ठेकुआ प्रमुख है।हालांकि बाजार में छठपूजा के सामानों की भरमार है।लोग अपनी आर्थिक हैसियत की मुताबिक अनेक तरह के महंगे फलों व सामानों की खरीदारी करते हैं लेकिन जो आम जन है वह पूरी सादगी व श्रद्धा के साथ इस लोकपर्व को मानाने की तैयारी में सपरिवार जुटे रहते हैं। यह पर्व अमीर और गरीब दोनो को ही एक ही घाट पर खडा कर देने वाला है।
             इस पर्व की खास बात यह है कि यह बिना पंडित,पुजारी के सहयोग के होने वाला पूजा कर्म है। लोग स्वतः स्फूर्त तरीके से यह सूर्योपासना करते हैं। कुल मिलाकर यह सामूहिक प्रयास से संपन्न होने वाला उत्सव है।सामूहिकता का बोध कराने वाला यह पर्व हर तरह के भेद-भाव से उपर उठकर सामूहिकता,पवित्रता व विश्वास की परंपरा को आगे बढाते हुए अपनी लोक संस्कृति को बचाये रखने वाला है।भले ही बिहार व यूपी से चलकर यह पर्व देशभर में प्रचलित हो गया हो लेकिन इस अवसर पर गाये जाने वाले गीत भोजपूरी में ही रचे गए है ।जो कि बरबस ही लोगों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। जैसे-
' केलवा जे फरेला घवद से,ओह पर सुगा मडराय,
कांच ही बांस के बहंगिया,बहंगी लचकत जाय/बात जे पूछेले बटोहिया बहंगी केकरा के जाय, तू त आन्हर हउए रे बटोहिया, बहंगी छठी मईया के जाय।
सेवेली चरन तोहार हे छठी मईया,महिमा तोहर अपार।'    
    कुल मिलाकर प्रत्यूषा और उषा के अभिवादन,वंदन और प्रतिष्ठा का यह अद्भुत पर्व लोक मंगल की भावना को स्थापित करने वाला है।